(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

आश्वमेधिकपर्व


॥ श्रीः ॥
14.35. अध्यायः 035
अथानुगीतापर्व-2
Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Topics
कृष्णेनार्जुनंप्रति ब्राह्मणीब्राह्मणशब्दनिर्दिष्टयोः क्रमेणि बुद्धिमनस्त्वकथनम्॥ 1 ॥
Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Text

ब्राह्मण उवाच।

नेदमल्पात्मना शक्यं वेदितुं वाऽकृतात्मना।
बहु चाल्पं च संक्षिप्तं विस्तृतं च मतं मम॥ 14-35-1(93315)
उपायं तं मम ब्रूहि येनैषा लभ्यते मतिः।
तन्मन्ये कारणं कर्म यत एषा प्रवर्तते॥ 14-35-2(93316)
ब्राह्मण उवाच। 14-35-3x(7852)
अरणीं ब्राह्मणीं विद्धि गुरुरस्योत्तरारणिः।
तपःश्रुतेभिमथिनी ज्ञानाग्निर्जायते ततः॥ 14-35-3(93317)
ब्राह्मणयुवाच। 14-35-4x(7853)
यदिदं ब्रह्मणो लिङ्गं क्षेत्रज्ञ इति संज्ञितम्।
ग्रहीतुं येन यच्छक्यं लक्षणं तस्य तद्वद॥ 14-35-4(93318)
ब्राह्मण उवाच। 14-35-5x(7854)
अलिङ्गो निर्गुणश्चैव कारणं नास्य विग्रहे।
उपायमेव वक्ष्यामि येन गृह्येत भावना॥ 14-35-5(93319)
सम्यगप्युपदिष्टस्य ह्यमृतस्येव तृप्यसे।
कर्मबुद्धिरबुद्धित्वाज्ज्ञानलिङ्गान्निपातितः। 14-35-6(93320)
इदं कार्यमिदं नेति न मोक्षेषूपदिश्यते।
पश्यतः शृण्वतो बुद्धिरात्मनैवोपजायते॥ 14-35-7(93321)
यावन्त इह शक्येरंस्तावतोंऽसान्प्रकल्पयेत्।
अव्यक्तान्व्यक्तरूपांश्च शतशोऽथ सहस्रशः॥ 14-35-8(93322)
सर्वानुमानयुक्तांश्च सर्वान्प्रत्यक्षहेतुकान्।
यतः परं न विद्येत ततोऽभ्यासे भविष्यति॥ 14-35-9(93323)
श्रीभगवानुवाच। 14-35-10x(7855)
ततस्तु तस्या ब्राह्मण्या मतिः क्षेत्रज्ञसंशये।
क्षेत्रज्ञानेन परतः क्षेत्रज्ञोऽन्यः प्रवर्तते॥ 14-35-10(93324)
अर्जुन उवाच। 14-35-11x(7856)
क्व नु सा ब्राह्मणि कृष्ण क्व चासौ ब्राह्मणर्षभः।
याभ्यां सिद्धिरियं प्राप्ता तावुभौ वद मेऽच्युत॥ 14-35-11(93325)
श्रीभगवानुवाच। 14-35-12x(7857)
मनो मे ब्राह्मणं विद्धि बुद्धिं मे विद्धि ब्राह्मणीम्।
क्षेत्रज्ञ इति यश्चोक्तः सोऽहमेव धनंजय॥ ॥ 14-35-12(93326)

इति श्रीमन्महाभारते आश्वमेधिकपर्वणि अनुगीतापर्वणि पञ्चत्रिंशोऽध्यायः॥

Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Footnotes
7-35-6 सम्यगुपायो दृष्टश्च भ्रमरैरिव लक्ष्यत इति झ.पाठः॥


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